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अमित गुप्ता (विधा : कविता ) (चलती रहे ज़िंदगी | सम्मान पत्र)

चलता हूँ….!!
टूटता हूँ , बिखरता हूँ, रोज..!
जिंदगी के सलीके सीखने में..!!

हर मंजिल पे नया मोड़ मिलता है,
जिंदगी के इस सफ़र में..!!

ख़्वाहिशें…!
कम हैं तो,
खेत कि मिट्टी पर भी चैन की नींद आती है,
वरना मखमल के बिस्तर भी चुभन देते हैं।

मखमल के बिस्तर वालों के ख्वाव नहीं कम होते हैं ।
खुद के खेत की मिट्टी जिसके पास उनमें ही दम होते हैं ।

कोई नहीं जहां में जिसे दुश्मन कहा जाए ।
प्रेम को पाया और प्रेम को ही बाँटा जाए ।।

जीवन के सफ़र के समाप्त होने के ठीक पहले,
हर कोई पहचान लेता है…!

जीवन एक बूँद है अमृत की…!
जिसे तुम कहते हो ज़हर, वह कुछ भी तो नहीं है…..!!!!

पा लेने को बेचैन….
कभी खो देने का डर….

बस इससे ज़्यादा कुछ नहीं,
ज़िंदगी का सफर ….!

✍🏻’अमित’

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