आंखों पर अंधेरा छाते ही,
उजागर होने लग जाते हैं,
मन में असुरक्षा के भाव,
तांडव करती है कल्पनाएं,
सोच किसी अनहोनी को,
और शुरू हो जाते हैं प्रयत्न,
प्रकाश को बुलाने के…
पर जब यही अंधेरा
हावी होता है जब विवेक पर,
बंध जाती है उसपर पट्टी,
स्वार्थ और वासना की,
बन जाता है इंसान,
एक क्रूर दानव सा,
करता है बलात्कार,
हथियाता है छीनता है,
वह सब जिस पर,
कदापि अधिकार नहीं,
उस अंधकार का इलाज,
किया जाता है एक और अंधेरे से,
जो दिया जाता है,
काल कोठरी में,
या सजा ए मौत में…