सागर किनारे बैठी मैं सोच रही
ये जीवन क्या है!!!?
गहरा सागर ही तो है,
इसकी अथाह अनंत गहराई की थाह कौन लगा पाया है?
इस जीवन की अनिश्चितता का अनुमान कौन कर पाया है?
सुख-दुख,शोक-हर्ष की लहरें
इस जीवन सागर में भी उठती-गिरतीं हैं,
इसको पार कोई कर पाया है?
जिसने किया,वही महापुरुष कहलाया है।
इस सागर में ,
विचारों की उत्ताल तरंगें चांद को भी छूने का प्रयास करतीं हैं,
इस सागर में,
जो भी श्रम रूपी पतवार को बेख़ौफ़ होकर चलाता है
वही साहिल तक पहुंच पाता है।
One Comment on “मुक्ता टंडन (सागर किनारे प्रतियोगिता | Gold pen)”
Excellent 👌👌क्या बात है।