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निशा टंडन। (विधा : कविता) (धोखा | सम्मान पत्र)

तेरे हर वादे पे किया यक़ीन इस क़दर हमने
कि सारी दुनिया को ही भुला बैठे हम
जो थे अपने वो एक एक कर बेगाने हुए
और हसीन लगने लगे हमें तेरे दिए हुए ग़म

हर सितम को तेरे सर आँखों पर रखा हमने
तुझसे बेइंतहा इश्क़ करने की क़ीमत यूँ चुकाते गए
चंद साँसें ही तो बख्शी थी उस रब ने हमको
और हँस कर हर साँस हम तुझ पर लुटाते गए

किया शिकवा न कोई और शिकायत भी नहीं
हर लम्हा बस तेरे दीदार को हम तरसते ही रहे
ज़ार ज़ार हुआ दिल बेरूख़ेपन से तेरे
और अश्कों से सैलाब बिन थमे बरसते गए

हर धड़कन पर हमारी लिखा था सिर्फ़ नाम तेरा
तूने ज़िंदगी का एक लम्हा भी हमारे नाम न किया
छुपते रहे तुम दुनिया से रुसवाई के डर से
और बेपनाह इश्क़ हमने तुमसे सरेआम किया

भुला बैठे अपनी दुनिया हम तेरे वादों के दम पर
और इस भूल की हमने देखो क़ीमत क्या चुकाई
मेरे दिल के टुकड़े किए तुमने इस बेदर्दी से कि
हर टुकड़े में फिर दुखभरी एक दास्तान नज़र आई

नहीं था मुमकिन वादों को निभाना तो कह देते हमसे
महज़ एक आस ने मेरे इश्क़ की लौ को बुझने ना दिया
ज़िंदगी के हर मोड़ पर जगा कर एक उम्मीद की किरण
मेरे इश्क़ को धोखा तुमने हर कदम पर दिया

निशा टंडन

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