मानवता
नैसर्गिकी नियम ही सब पर
भारी सदा कहाते हैं
जीवन के रथ के दो पहिए
नर और नारी कहाते हैं
फिर भी क्यों कुछ मानवता के
शत्रु कहाए जाते हैं ।
पर आए जब कली कोख में
औजार से बलि चढ़ाते हैं
पुत्र रत्न को रोते फिरते
सजा बुढ़ापे में पाते हैं
बस यही तो मानवता के
शत्रु कहाए जाते हैं ।
देकर जन्म बनाते लायक
फिर औरों को सौंपी जाती है
नर्क बना देते जीवन को
कभी न अपनापन पाती है ।
बस यह छोटी सोच ही
मानवताकी
शत्रु कहाई जाती है।
गिद्धों और कौवों की भांति
नोच जिस्म को खाते हैं
इंसानों की सूरत में
हैवान कहाए जाते हैं ।
बस ये ही तो मानवता के
शत्रु कहाए जाते हैं ।
पद और धन की अति लिप्सा ही
न्याय खोखला करती है
न्याय हेतु जहां हुई महाभारत
अब मोमबत्ती थमाई जाती है
बस ऐसी ही सोच मानवता की
शत्रु कहाई जाती है।
( स्वरचित ) अनामिका जोशी “आस्थ